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Crude Oil Price: कच्चा तेल 100 डॉलर के पार, भारत में पेट्रोल-डीजल और महंगाई पर पड़ सकता है असर

TV 24 Network July 24, 2026 0
कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंची
Crude Oil Price Crosses 100 Dollar Per Barrel

दुनियाभर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमत में तेज उछाल देखने को मिला है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत कुछ समय के लिए 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। हालांकि, 24 जुलाई 2026 को शुरुआती कारोबार में कीमत थोड़ी नीचे भी आई, लेकिन यह अब भी लगभग 99 से 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI का भाव लगभग 91 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया।

 

तेल की कीमत में यह बढ़ोतरी केवल मांग बढ़ने के कारण नहीं हुई है। इसके पीछे पश्चिम एशिया में जारी तनाव और समुद्री मार्गों से तेल की सप्लाई बाधित होने का डर प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

 

लाल सागर में तेल टैंकरों पर हमले

रिपोर्टों के अनुसार, लाल सागर में सऊदी अरब के दो तेल टैंकरों पर हमले के बाद वैश्विक बाजार में चिंता बढ़ गई है। इन हमलों के कारण व्यापारियों को डर है कि तेल ले जाने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।

 

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते हैं। यदि इन मार्गों पर खतरा बढ़ता है, तो तेल टैंकरों को अफ्रीका के चारों ओर से लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है। इससे यात्रा का समय, बीमा खर्च और माल ढुलाई की लागत काफी बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।

 

होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी चिंता

तेल बाजार पहले से ही होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान की आशंका का सामना कर रहा है। यह मार्ग पश्चिम एशिया से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कच्चा तेल पहुंचाने के सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में शामिल है।

 

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। अब लाल सागर के रास्ते पर भी खतरा बढ़ने से बाजार को दो महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर सप्लाई बाधित होने का डर सता रहा है। इसी आशंका ने ब्रेंट क्रूड को दो महीने में पहली बार 100 डॉलर के स्तर के ऊपर पहुंचा दिया।

 

भारत पर क्या होगा असर?

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने से भारत का आयात खर्च बढ़ सकता है। तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च होने पर देश के व्यापार घाटे और रुपये पर भी दबाव पड़ सकता है।

 

यदि कच्चे तेल की ऊंची कीमत लंबे समय तक बनी रहती है, तो पेट्रोलियम कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और विमान ईंधन की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। हालांकि, पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें बढ़ेंगी या नहीं, इसका फैसला सरकार, तेल कंपनियों, टैक्स और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

 

महंगाई बढ़ने का खतरा

डीजल की कीमत बढ़ने पर ट्रक और अन्य मालवाहक वाहनों का खर्च बढ़ जाता है। इससे सब्जियों, फलों, दूध, अनाज और रोजमर्रा के सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना महंगा हो सकता है। कंपनियां बढ़ा हुआ परिवहन खर्च ग्राहकों से वसूल सकती हैं, जिससे बाजार में वस्तुओं की कीमत बढ़ने का खतरा रहता है।

 

महंगा कच्चा तेल एयरलाइंस, प्लास्टिक, पेंट, केमिकल, सीमेंट और लॉजिस्टिक्स जैसे उद्योगों की लागत भी बढ़ा सकता है। वैश्विक स्तर पर तेल के 100 डॉलर तक पहुंचने से महंगाई दोबारा बढ़ने और आर्थिक विकास की गति धीमी होने की चिंता पैदा हो गई है।

 

क्या कीमत 120 डॉलर तक जा सकती है?

कुछ बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समुद्री रास्तों पर हमले जारी रहते हैं और तेल की सप्लाई में वास्तविक कमी आती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह केवल एक संभावना है। तनाव कम होने, समुद्री रास्ते सुरक्षित होने या अन्य देशों द्वारा उत्पादन बढ़ाने पर कीमतों में गिरावट भी आ सकती है।

 

फिलहाल पूरी दुनिया की नजर पश्चिम एशिया की स्थिति और तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों की दिशा इन्हीं घटनाओं पर निर्भर करेगी।

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कच्चा-तेल पेट्रोल-डीजल महंगाई तेल-बाजार भारत-की-अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय-खबर
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अमेरिका ने वैश्विक सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए भारत सहित 60 से अधिक देशों को अगले सप्ताह आयोजित होने वाले विशेष सुरक्षा सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। इस सम्मेलन की मेजबानी अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो करेंगे। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते राजनीतिक और आतंकवादी खतरों पर चर्चा करना तथा सदस्य देशों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है।   आतंकवाद के बदलते स्वरूप पर होगी चर्चा अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, सम्मेलन में उन चुनौतियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जिन्हें अमेरिका अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक हिंसा और सीमापार आतंकवाद के रूप में देख रहा है। बैठक में विभिन्न देशों के वरिष्ठ मंत्री और सुरक्षा अधिकारी शामिल होंगे तथा आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए साझा रणनीति तैयार करने पर विचार करेंगे।   भारत की भागीदारी क्यों है अहम? भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद और चरमपंथ का सामना करता रहा है। ऐसे में इस सम्मेलन में भारत की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत पहले भी आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करने और आतंकियों के वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देता रहा है।   विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपने अनुभवों के आधार पर सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण सुझाव रख सकता है, जिनसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद विरोधी प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।   कई देशों के बीच बढ़ेगा सुरक्षा सहयोग सम्मेलन में एशिया, यूरोप, अमेरिका और अन्य क्षेत्रों के 60 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। बैठक के दौरान निम्नलिखित विषयों पर चर्चा हो सकती है— आतंकवादी संगठनों की नई रणनीतियां। देशों के बीच खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान। ऑनलाइन कट्टरपंथ और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग को रोकना। आतंकवाद के लिए होने वाली फंडिंग पर रोक। वैश्विक सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय।   ट्रंप प्रशासन की नई सुरक्षा प्राथमिकता यह सम्मेलन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नई आतंकवाद-रोधी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि बदलते वैश्विक हालात में राजनीतिक हिंसा और आतंकवाद के नए स्वरूपों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। इसी उद्देश्य से यह उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की जा रही है।   कुछ सहयोगी देशों ने जताई अलग राय हालांकि, इस पहल को लेकर सभी देशों की राय एक जैसी नहीं है। कुछ यूरोपीय अधिकारियों और स्वतंत्र सुरक्षा विशेषज्ञों ने सम्मेलन के मुख्य फोकस और खतरे के आकलन पर अलग दृष्टिकोण व्यक्त किया है। उनका मानना है कि विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियों की प्रकृति अलग-अलग है और उन्हें व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है।   वैश्विक सुरक्षा के लिए अहम बैठक विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समय में आतंकवाद और राजनीतिक हिंसा जैसी चुनौतियां किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में बहुपक्षीय सहयोग, सूचना साझा करना और संयुक्त रणनीति बनाना समय की आवश्यकता है। भारत की भागीदारी इस सम्मेलन को और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि वह लंबे समय से वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ सख्त और समन्वित कार्रवाई की वकालत करता रहा है। आने वाले दिनों में इस सम्मेलन से जुड़े फैसलों पर दुनिया की नजर रहेगी।

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ईरान ने फ्रांस और ब्रिटेन को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि दोनों देश होरमुज़ जलडमरूमध्य में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ाते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ईरान का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी क्षेत्रीय देशों की है और बाहरी शक्तियों की सैन्य मौजूदगी से हालात और बिगड़ सकते हैं।   होरमुज़ जलडमरूमध्य क्यों है अहम होरमुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में शामिल है। इसी मार्ग से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की आपूर्ति होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।   ईरान का सख्त बयान ईरानी अधिकारियों ने साफ कहा है कि विदेशी देशों की सैन्य तैनाती को उकसावे वाली कार्रवाई माना जाएगा। ईरान का आरोप है कि पश्चिमी देश क्षेत्र में दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। तेहरान ने चेतावनी दी है कि अगर उसकी सुरक्षा को खतरा हुआ, तो वह चुप नहीं बैठेगा और जवाबी कदम उठाएगा।   फ्रांस और ब्रिटेन की भूमिका फ्रांस और ब्रिटेन समुद्री सुरक्षा के नाम पर खाड़ी क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की बात कर रहे हैं। दोनों देशों का कहना है कि उनका उद्देश्य व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि ईरान इसे अपने खिलाफ सैन्य दबाव की रणनीति मान रहा है।   बढ़ सकती है अंतरराष्ट्रीय चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बयानबाजी सैन्य टकराव में बदलती है, तो मध्य पूर्व में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। इसका असर केवल क्षेत्रीय राजनीति पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।   बातचीत ही समाधान फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहा है। कूटनीतिक बातचीत के जरिए ही तनाव कम किया जा सकता है। ईरान, फ्रांस और ब्रिटेन के बीच बढ़ती तल्खी ने एक बार फिर खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

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